Tuesday, 9 August 2011

कहां है

कहने को बहुत कुछ है मगर,
लेकिन शब्दों में विराम सा है,
राते कटती दर्द में अब तो,
सुबह को भी चैन कहां है,

प्रश्रों के संसार में,
उत्तर को भी वक्त कहां है,
लगा प्रश्रचिन्ह अस्तिव में,
खुद की भी पहचान कहां है,

डमरू, ढोलक पीटे सब,
फिर भी सफलता का वो सौपान कहां है,
खोज में निकले थे बरसों पहले,
जीवन की वो खोज कहां है,

हर पल धोखे खाए है,
विश्वास को भी वक्त कहां है,
महफिलों में मुस्काते है,
फिर भी दिल में सुकुन कहां है।
 अक्षय मिश्रा

Sunday, 24 April 2011

मैं झूठा पथ प्रदर्शक

कहते-कहते रुक जाता हूं,
विचारों को अपने पी जाता हूं,
मंथन से निकले मोती को,
दिखलाने से डर जाता हूं।

लबों को सिए रहता हूं,
कलम बेच जिए रहता हूं,
अभिव्यक्ति के सागर में,
शब्द खोज जिए रहता हूं।

मक्कारों के  कलाम सुनता हूं,
खुद का अपमान चुनता हूं,
जीने की आस में अब,
झूठे शब्दों को बुनता हूं।

कलम की ताकत दिखलाता हूं,
दौर क्रान्ति का लाता हूं,
रसूखदारों की तलवार के आगे,
घुटने टेकता जाता हूं।

गीत शांति के गाता हूं,
नित नये ख्वाब दिखलाता हूं,
मैं झूठा पथ-प्रदर्शक,
निर्माता समाज का कहलाता हूं।

अक्षय मिश्रा

Saturday, 9 April 2011

जीने की राह में

राहों में हज़ार रोड़े हैं,
ख्वाबों की सॉल ओड़े हैं,
मंजिल पाने की होड़ में,
अपनों से दूर थोड़े हैं।

लुट  रहे अरमान हैं,
खो रही पहचान हैं,
धूमिल होते अस्तित्व को,
जीने का अरमान हैं।

मर-मर कर जी रहे हैं,
जहर गुलामी पी रहे हैं,
याद आती हैं वो वीर बलियां,
जो देश के नाम अर्पित हैं।

पथ भटक गया शेरों का,
साथ हो गया गैरों का,
रात कटी है खौफ में,
डर है अब बसेरों का।

चलते कांटों की सेज पर,
लड़ते मौत की रेत पर,
लेकिन शंख बजता है अब,
बस झूठों की मौत पर।

लहरों की मौज चाहिए,
हवा की ठंडक चाहिए,
जीना है सुकुन से अब,
तो आत्म-बलि चाहिए।
अक्षय मिश्रा






Tuesday, 29 March 2011

पीछा करती हैं वो आंखें


काली घनी रात थी, और कड़ाके की ठंड़ ने लोगों को उनके घरों में कैद कर रखा था। मैं भी उनहीं कैदियों में से एक था। ज्यों-ज्यों घड़ी की सुई सरकती जाती त्यों-त्यों ठंड़ अपने यौवन में प्रवेश करती जाती। मैं भी कागज़ की तरह अपने बिस्तर पर पड़ा रौशनदान से आसमां को निहार रहा था कि एकाएक मेरी नजऱ चंद्रमा पर जाकर ठिक गई। चांद को देख ऐसा प्रतित हो रहा था, जैसे कि वो हवा के ठंड़े झोंकों के बीच बड़ी ही बेसबरी से किसी का इंतजार कर रहा हो। चांद की इस इंतजार को देख मेरा मन भी समंदर की लहरों की तरह हिलोरे मारने लगा, मुझे भी अपनी ख्वाबों की प्रेसी की याद सताने लगी। ज्यों-ज्यों ठंड़ अपने शबाब पर आती त्यों-त्यों मेरी बेचेनी बढ़ती जा रही थी। मैं अपनी उमंगों को समेटे चांद को फिर से निहार ने लगा, लेकिन इस बार चांद अकेला न था। काले घटाओं की ओट में मानों किसी से बातें कर रहा हो। मैं वो अदभुत नज़ारा आंखों में समेटे पान खाने बाज़ार की ओर चल पड़ा। अपनी ख्वाबों की मलिका की यादों में डूबा, मैं खुद से बातें करते हुए वीरान सडक़ पर चला जा रहा था। एकाएक गाड़ी की पी-पी से मेरी निंद्रा टूट गई, आखें खुली तो देख में बाज़ार में था। बाज़ार को देख ऐसा लगा मानों किसी ने मुझे काटों के सेज पर लिटा दिया हो।
एकाएक मेरी नज़र बाज़ार में मच रहे कोहराम पर पड़ी, ऐसा मंजर देख मेरी आंखें फटी की फटी रह गई, मेरी सारी उमंगें न जाने कहां खो गई। चंद मुठ्ठी भर व्यापारी एक 17-18 बरस की लडक़ी को बाज़ारु कहते हुए गालियां दे रहे थे। वहीं ये बुद्धिजीवी समाज चुप्पी साधे ये नग्र नाच बड़े मज़े से देख रहा था। आज इस सामाजिक बेडिय़ों ने मुझे बांध लिया, मैं भी मूक बन इस भयावह दृश्य को देख रहा था। वो लडक़ी सिर झुकाए, चुप्पी साधे, सामाज की कठोरता को देख वहां से चली गई, लेकिन मुझ पर सवालों का बोझ डाल गई। उस लडक़ी के मौन में वेदना थी और कई प्रश्र भी, मानो वो पूंछ रही हो कि इस समाज मैं सब मोम के पुतले बन गए है, क्या दुनिया से मानवता का अंत हो चुका है? किसी में इतनी हिम्मत भी नहीं है कि सामने आकर उन बातों का विरोध कर सकें। इस आधुनिक युग में भी लड़कियों की ऐसी गति देख मेरा मन द्रवित हो उठा, मैं खुद को कोस रहा था कि आखिर मैं मौन क्यों खड़ा रहा? मैं अपने बौनेपन को धिक्कार रहा था कि एकाएक मेरे मन मैं एक प्रश्र पैदा हो गया। क्या वो लडक़ी वास्तव में बाज़ारु है? मैं बेचेन हो उठा मेरे मन में उस लडक़ी से बात करने की जिज्ञासा जाग उठी, लेकिन वो तो वहां से जा चुकी थी। मैं उसे ढूंढऩे के लिए भागा, जैसे एक अबोध बालक अपना मां का पल्लू पकडऩे के लिए उसके पीछे-पीछे भागता है। वो मुझे मिल गई, मेरी आंखों के सामने खड़ी थी। उसे देख मुझे ऐसा लगा मानो मेरी अधूरी तपस्या पूर्ण हो गई। मेरे मन में उठ रहे उफान एकाएक थम से गए, मेरी व्याकुलता शांत हो गई। इतनी असीम शांति मुझे पहले कभी न मिली थी।
मैंने उससे बात करना चाहता था, लेकिन न जाने क्या हुआ मैं उससे कुछ कह न सका? शब्द मेरे जुबान पर आते-आते गुंगें हो जाते। वो लडक़ी की आंखे मेरी ओर देखते हुए मानो कह रही थी कि अब क्या हुआ? बोलते क्यों नहीं? तुम तो कुछ पूंछने आए थे न, तो फिर पूंछते क्यों नहीं? तुम मुझ से बातें करना चाहते थे, तो फिर क्यों मूक बने खड़े हो? उसकी निरंतर हो रहे ये प्रहार मेरे अंर्तमन को भेद रहे थे। मेरी आंखे शर्म से झुक गई। वो लडक़ी वहां से जाने लगी, मैं उसे रोकना चाहता था पर उसे रोकने की हिम्मत मुझमें न थी। उसकी अचल शांति देख मेरी जुबान ठिठक सी गई, मैं चाहते हुए भी कुछ कह नहीं पा रहा था। उससे से चार बातें करने की चाहत में मैं भी उसके पीछे-पीछे चल पड़ा, ऐसा लग रहा था जैसे वो मेरी पथ प्रदर्शक हो। मैं उसके पीछे चलते-चलते अपने घर तक आ पहुंचा, लेकिन उससे एक भी बात न कर सका। चांद की शीतलता भी अब मुझे रास नहीं आ रही थी। वो लडक़ी मुझे निहारते हुए वहां से चली गई। मानों मुझ से कह रही हो लो आज फिर समाज ने एक मानुष को बौना बना दिया, उसकी जिज्ञासा पर शिल का बोझ रख दिया। उस लडक़ी के तीखे प्रहार और मेरी अशांत जिज्ञासाओं ने मुझे उस लडक़ी को ढूंढऩे मजबूर कर दिया।  उस रात के बाद मैं कई रातें भटकता रहा, बस इस आस में की शायद वो लडक़ी मुझे फिर से मिल जाए, मैं उससे कुछ बातें कर संकू, लेकिन फिर वो मुझे कभी न मिली। उस लडक़ी के तीखे प्रश्र और उसकी वो गंभीर आंखें आज भी मेरा पीछा कर रहीं हैं।
अक्षय मिश्रा    

Thursday, 17 March 2011

होली की हुड़दंग

होली की हुड़दंग,
आज खेलेंगे रंग,
पिया डोर की,
बन के पतंग,
भंग के संग,
घुलेगा अब रंग,
आसमां भी होगा,
आज लाल रंग,
जिंदगी की उमंग,
रहेगी अब संग,
प्यार का दिखेगा,
अब सतरंग,
घिसके बदन पर चंदन,
निकलेगी वो,
बन के किरण,
प्यार की होंगी,
आज कुछ बातें,
नम आंखों से,
होंगी मुलाकातें,
दिल की तरंग को,
लग गए पंख,
उडऩे को हूं,
बेताब तेरे संग,
घिस-घोंट कर,
पिलाईगी वो भंग,
झुम उठेगा फिर,
मेरा तन मन,
आज बनऊंगा मैं,
फिर से पवन,
दंग रहेंगे सब,
ये देख मेरा रंग,
झूम उठेगा,
आज ये गगन,
देख मेरे,
पिया की प्रेम अगन।

अक्षय मिश्रा




Friday, 11 March 2011

पैसों की दुनिया

पैसों की इस दुनिया में सब कुछ बेचा जाता है,
पैसों के दरबार में हर कोई शीष झुकाता है,
जो मोल लगाए सही-सही,
वो सब कुछ पाता जाता है,
पैसों की इस दुनिया में सब कुछ बेचा जाता है।
बेटों का यहां भाव लागकर,
पैसा दबाया जाता है,
बहू-बेटी को बेच यहां,
माल कमाया जाता है,
पैसों की इस दुनिया में सब कुछ बेचा जाता है।
हर सत्ता के गलियारे में,
पैसों का परचम लहराता है,
नोटों के सम्मान में,
ईमान तक बिक जाता है,
पैसों की इस दुनिया में सब कुछ बेचा जाता है।
समझदारों की इस दुनिया में,
पैसा ही हर दम गाता है,
ईश्वर भक्ति को भी अब,
पैसों से तोला जाता है,
पैसों की इस दुनिया में सब कुछ बेचा जाता है।
सिक्कों की खनक से,
बच्चा भी मुस्काता है,
आटे की लेई छोड़,
नोट उसे अब भाता है,
पैसों की इस दुनिया में सब कुछ बेचा जाता है।
देख सच्चाई दुनिया की मैं,
अब घबरा सा जाता हंू,
जीने की तलाश में,
मौत बेच कर आता हूं,
पैसों की इस दुनिया में सब कुछ बेचा जाता है।
पैसों के जंजाल में,
हर कोई फंसता जाता है,

धन की कोरी चाहत में,
रोज़ ठगा कोई जाता है,
पैसों की इस दुनिया में सब कुछ बेचा जाता है।
देख दस्तूर दुनिया का,
मैं चकित रह जाता हूं,


धनवानों के जोर के आगे,
चुप्पी साधे रह जाता हूं,
पैसों की इस दुनिया में सब कुछ बेचा जाता है।
पैसों के दरबार में हर कोई शीष झुकाता है,
जो मोल करे पैसे का, वहीं बुद्धिजीवी कहलाता है।
अक्षय मिश्रा
 
 

Thursday, 3 February 2011

आत्मकथा-ए-अखबार


वैसे तो मैं (अखबार) फारसी शब्द खबर का बहुवचन हूं, अर्थात जिसमें कई खबरों का समन्वय हो उसे अखबार कहते हैं।
भारत की आजादी के संघर्ष के दौरान देशभक्तों के रुप में कई प्रखर पत्रकारों ने मुझे विभिन्न रुपों में निखारा जैसे- भारतेन्दु ने कविवचन सुधा के रुप में, पं युगल किशोर शुक्ल ने उदन्त मार्तण्ड के रुप में, गणेश शंकर विद्यार्थी ने प्रताप के रुप में, प्रेमचन्द ने हंस के रुप में इसी तरह कई प्रखर पत्रकारों ने मुझे विभिन्न तेजस्वी रुप प्रदान किए।
किसी ने मेरे माध्यम से भाषा का प्रचार किया, तो किसी ने समाज का निर्माण, तो किसी ने स्वतंत्रता को लक्ष्य बनाकर
जागरुकता का संदेश दिया। इस तरह मुझमें सकारात्मक विचारों का सूत्रपात हुआ।
भारत की आजादी के बाद मुझमें व्यापक रुप में परिवर्तन आए। परिवर्तन तो प्रकृति का नियम है, पर ये कैसा परिवर्तन हो रहा है, जो धीरे-धीरे मुझे अंधकार के रास्ते पर ही ढक़ेलता प्रतीत हो रहा है?
देशभक्तों के घातक शस्त्रों में से एक, विश्व के सबसे बड़े प्रजातांत्रिक राष्ट्र के जनतंत्र का चौथा स्तम्भ माना जाने वाला मैं, आज महज चंद आयामों में बंध कर रह गया हूं। आज मैं किसी के लिए धन अर्जित करने का साधन हूं, तो किसी महिला के लिए घर सजाने की सामग्री। ठीक इसी तरह एक पनवारी के लिए पान, गुटका लपेटने का महज एक कागज का टुकड़ा।
यह वसुध मानव ये भूल गया है कि मैं वही अखबार हूं। जिसने अपनी शब्द भेदी बाणों की ताकत के बूते क्रांति की लहर उत्पन्न कर हिन्दुस्तान को अंग्रेजों के अत्याचारों से मुक्त कराया था।
स्वाधीन विचारों मे डूबे रहने वाला मैं (अलबेला पत्र) आज चंद पार्टियों और कुछ नामी व्यापारियों के हाथों अपना दमन होते देख रहा हूं। और निर्जीव सा किसी मेज पर पड़ा हूं। किसी काल में लोगों को हथियार बनकर उनकी सहायता करने वाला मैं आज खुद निहत्था इस कठोर समाज के बीचों-बीच खड़ा सहायक को ढूंढ़ रहा हूं। न जाने वो दिन कब आएगा जब मैं अपने धूल में सने गरिमावान और तेजस्वी चेहरे को किसी के द्वारा साफ करता महसूस कर पाऊंगा।
भष्टाचार के बियावान में मैं एक सच्चे पथप्रदर्शक की तलाश में भटक रहा हूं। जो मुझे इस बियावान से बाहर निकालने का सार्थक प्रयास करें। अब तो बच्चे, बूढ़े सब मुझे बारूद में लपेट कर इस तरह जलाते हैं, मानो किसी निराश्रित देह की अंत्येष्टि कर रहे हो। वो भी बड़ी मौज मस्ती के साथ।
मैंने बहुत समय पूर्व ग्रन्थों में पढ़ा था कि पाप का घड़ा भर जाने पर धरा को भार मुक्त करने के लिए ईश्वर अवतरित होते है। न जाने वो दिन कब आएगा जब मुझे भी कोई मसीहा आकर इस भष्टाचारी दलदल से बाहर निकलकर मेरे विचारों को पुन: स्वाधीनता प्रदान करेगा।
अब तो बुद्धिजीवी पाठक मुझे देख सहसा ये कह देते है कि-
मैं किसका कत्ल करुं, किसको लूटने जांऊ,
रहा सहा मेरा दम-खम निकल जाता है।
वो मुंह अंधेरे इक अखबार बेचने वाला,
हजार लाशें मेरे घर में डाल जाता है।
अक्षय मिश्रा

Wednesday, 2 February 2011

माँ का दर्द

             
नौ महीने गर्भ में रखकर, जिसको मैंनें जन्म दिया।
अपने स्तन का दूध पिलाकर, जिसको मैंनें कर्म दिया।
ममता के धागें में,संस्कार के मोती पिरोकर, जिसे मैंनें बड़ा किया।
वो प्रतिमूर्ति है मेरी, जिसने मुझे बेघर किया।
लाख वेदना झेली दिल ने, अब न दम इसमें बाकी है।
आंख सूख गई, कमर झुक गई, अब लाठी मेरी साथी है।
समय के काल च्रक में, पल वो बीते ढूंढ रही हूं।
उम्मीदों के कोने में, थोड़ी आस बाकी है।
बड़े दिनों बाद उसे, मेरी याद आई है।
बीमारी के समाचार से, घर में रौनक आई है।
बच्चों की धमाचौकड़ी, मुझे बड़ा हंसाई है।
इस बेजान बुढिय़ा में, अब फिर से जान आई है।
बेटा पूछे मां तू कैसी, पोता दूध पिलाता है।
बहू की सेवा देख, दिल भी पिघल जाता है।
पकवानों ने घर को फिर से महकाया है।
परिवार का साथ देख, दिल मेरा भर आया है।
मेरे मरने चिंता सबको बड़ा सताई है।
बची कमाई पर सबने आंख गड़ाई है।
बहू देखे जेवर, बेटा सोचे धन कहां,
बूढिय़ा को फूंकने, जल्दी सब पे आयी है।
मेरे दिल की बलि चढ़ गई।
घर में बजी बधाई।
सबकी काली नियत सेे,
कालिख मुझ पर आयी।