Saturday, 9 April 2011

जीने की राह में

राहों में हज़ार रोड़े हैं,
ख्वाबों की सॉल ओड़े हैं,
मंजिल पाने की होड़ में,
अपनों से दूर थोड़े हैं।

लुट  रहे अरमान हैं,
खो रही पहचान हैं,
धूमिल होते अस्तित्व को,
जीने का अरमान हैं।

मर-मर कर जी रहे हैं,
जहर गुलामी पी रहे हैं,
याद आती हैं वो वीर बलियां,
जो देश के नाम अर्पित हैं।

पथ भटक गया शेरों का,
साथ हो गया गैरों का,
रात कटी है खौफ में,
डर है अब बसेरों का।

चलते कांटों की सेज पर,
लड़ते मौत की रेत पर,
लेकिन शंख बजता है अब,
बस झूठों की मौत पर।

लहरों की मौज चाहिए,
हवा की ठंडक चाहिए,
जीना है सुकुन से अब,
तो आत्म-बलि चाहिए।
अक्षय मिश्रा






1 comments:

अंतर्मन said...

bro... mujhe yah kavita ek dusre chand se judi hui nahi lag rahi hai.. bakki kavita ka bhav bahoot accha hai...