राहों में हज़ार रोड़े हैं,
ख्वाबों की सॉल ओड़े हैं,
मंजिल पाने की होड़ में,
अपनों से दूर थोड़े हैं।
ख्वाबों की सॉल ओड़े हैं,
मंजिल पाने की होड़ में,
अपनों से दूर थोड़े हैं।
मर-मर कर जी रहे हैं,
जहर गुलामी पी रहे हैं,
याद आती हैं वो वीर बलियां,
जो देश के नाम अर्पित हैं।
साथ हो गया गैरों का,
रात कटी है खौफ में,
डर है अब बसेरों का।
चलते कांटों की सेज पर,
लड़ते मौत की रेत पर,
लेकिन शंख बजता है अब,
बस झूठों की मौत पर।
लड़ते मौत की रेत पर,
लेकिन शंख बजता है अब,
बस झूठों की मौत पर।
लहरों की मौज चाहिए,
हवा की ठंडक चाहिए,
जीना है सुकुन से अब,
तो आत्म-बलि चाहिए।
हवा की ठंडक चाहिए,
जीना है सुकुन से अब,
तो आत्म-बलि चाहिए।
अक्षय मिश्रा

1 comments:
bro... mujhe yah kavita ek dusre chand se judi hui nahi lag rahi hai.. bakki kavita ka bhav bahoot accha hai...
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