कहते-कहते रुक जाता हूं,
विचारों को अपने पी जाता हूं,
मंथन से निकले मोती को,
दिखलाने से डर जाता हूं।
लबों को सिए रहता हूं,
कलम बेच जिए रहता हूं,
अभिव्यक्ति के सागर में,
शब्द खोज जिए रहता हूं।
मक्कारों के कलाम सुनता हूं,
खुद का अपमान चुनता हूं,
जीने की आस में अब,
झूठे शब्दों को बुनता हूं।
कलम की ताकत दिखलाता हूं,
दौर क्रान्ति का लाता हूं,
रसूखदारों की तलवार के आगे,
घुटने टेकता जाता हूं।
गीत शांति के गाता हूं,
नित नये ख्वाब दिखलाता हूं,
मैं झूठा पथ-प्रदर्शक,
निर्माता समाज का कहलाता हूं।
अक्षय मिश्रा
विचारों को अपने पी जाता हूं,
मंथन से निकले मोती को,
दिखलाने से डर जाता हूं।
लबों को सिए रहता हूं,
कलम बेच जिए रहता हूं,
अभिव्यक्ति के सागर में,
शब्द खोज जिए रहता हूं।
मक्कारों के कलाम सुनता हूं,
खुद का अपमान चुनता हूं,
जीने की आस में अब,
झूठे शब्दों को बुनता हूं।
कलम की ताकत दिखलाता हूं,
दौर क्रान्ति का लाता हूं,
रसूखदारों की तलवार के आगे,
घुटने टेकता जाता हूं।
गीत शांति के गाता हूं,
नित नये ख्वाब दिखलाता हूं,
मैं झूठा पथ-प्रदर्शक,
निर्माता समाज का कहलाता हूं।
अक्षय मिश्रा
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