Thursday, 3 February 2011

आत्मकथा-ए-अखबार


वैसे तो मैं (अखबार) फारसी शब्द खबर का बहुवचन हूं, अर्थात जिसमें कई खबरों का समन्वय हो उसे अखबार कहते हैं।
भारत की आजादी के संघर्ष के दौरान देशभक्तों के रुप में कई प्रखर पत्रकारों ने मुझे विभिन्न रुपों में निखारा जैसे- भारतेन्दु ने कविवचन सुधा के रुप में, पं युगल किशोर शुक्ल ने उदन्त मार्तण्ड के रुप में, गणेश शंकर विद्यार्थी ने प्रताप के रुप में, प्रेमचन्द ने हंस के रुप में इसी तरह कई प्रखर पत्रकारों ने मुझे विभिन्न तेजस्वी रुप प्रदान किए।
किसी ने मेरे माध्यम से भाषा का प्रचार किया, तो किसी ने समाज का निर्माण, तो किसी ने स्वतंत्रता को लक्ष्य बनाकर
जागरुकता का संदेश दिया। इस तरह मुझमें सकारात्मक विचारों का सूत्रपात हुआ।
भारत की आजादी के बाद मुझमें व्यापक रुप में परिवर्तन आए। परिवर्तन तो प्रकृति का नियम है, पर ये कैसा परिवर्तन हो रहा है, जो धीरे-धीरे मुझे अंधकार के रास्ते पर ही ढक़ेलता प्रतीत हो रहा है?
देशभक्तों के घातक शस्त्रों में से एक, विश्व के सबसे बड़े प्रजातांत्रिक राष्ट्र के जनतंत्र का चौथा स्तम्भ माना जाने वाला मैं, आज महज चंद आयामों में बंध कर रह गया हूं। आज मैं किसी के लिए धन अर्जित करने का साधन हूं, तो किसी महिला के लिए घर सजाने की सामग्री। ठीक इसी तरह एक पनवारी के लिए पान, गुटका लपेटने का महज एक कागज का टुकड़ा।
यह वसुध मानव ये भूल गया है कि मैं वही अखबार हूं। जिसने अपनी शब्द भेदी बाणों की ताकत के बूते क्रांति की लहर उत्पन्न कर हिन्दुस्तान को अंग्रेजों के अत्याचारों से मुक्त कराया था।
स्वाधीन विचारों मे डूबे रहने वाला मैं (अलबेला पत्र) आज चंद पार्टियों और कुछ नामी व्यापारियों के हाथों अपना दमन होते देख रहा हूं। और निर्जीव सा किसी मेज पर पड़ा हूं। किसी काल में लोगों को हथियार बनकर उनकी सहायता करने वाला मैं आज खुद निहत्था इस कठोर समाज के बीचों-बीच खड़ा सहायक को ढूंढ़ रहा हूं। न जाने वो दिन कब आएगा जब मैं अपने धूल में सने गरिमावान और तेजस्वी चेहरे को किसी के द्वारा साफ करता महसूस कर पाऊंगा।
भष्टाचार के बियावान में मैं एक सच्चे पथप्रदर्शक की तलाश में भटक रहा हूं। जो मुझे इस बियावान से बाहर निकालने का सार्थक प्रयास करें। अब तो बच्चे, बूढ़े सब मुझे बारूद में लपेट कर इस तरह जलाते हैं, मानो किसी निराश्रित देह की अंत्येष्टि कर रहे हो। वो भी बड़ी मौज मस्ती के साथ।
मैंने बहुत समय पूर्व ग्रन्थों में पढ़ा था कि पाप का घड़ा भर जाने पर धरा को भार मुक्त करने के लिए ईश्वर अवतरित होते है। न जाने वो दिन कब आएगा जब मुझे भी कोई मसीहा आकर इस भष्टाचारी दलदल से बाहर निकलकर मेरे विचारों को पुन: स्वाधीनता प्रदान करेगा।
अब तो बुद्धिजीवी पाठक मुझे देख सहसा ये कह देते है कि-
मैं किसका कत्ल करुं, किसको लूटने जांऊ,
रहा सहा मेरा दम-खम निकल जाता है।
वो मुंह अंधेरे इक अखबार बेचने वाला,
हजार लाशें मेरे घर में डाल जाता है।
अक्षय मिश्रा

1 comments:

Ashvinisaraf said...

मजा आ गया दोस्त .लाजवाब .lucky