Wednesday, 2 February 2011

माँ का दर्द

             
नौ महीने गर्भ में रखकर, जिसको मैंनें जन्म दिया।
अपने स्तन का दूध पिलाकर, जिसको मैंनें कर्म दिया।
ममता के धागें में,संस्कार के मोती पिरोकर, जिसे मैंनें बड़ा किया।
वो प्रतिमूर्ति है मेरी, जिसने मुझे बेघर किया।
लाख वेदना झेली दिल ने, अब न दम इसमें बाकी है।
आंख सूख गई, कमर झुक गई, अब लाठी मेरी साथी है।
समय के काल च्रक में, पल वो बीते ढूंढ रही हूं।
उम्मीदों के कोने में, थोड़ी आस बाकी है।
बड़े दिनों बाद उसे, मेरी याद आई है।
बीमारी के समाचार से, घर में रौनक आई है।
बच्चों की धमाचौकड़ी, मुझे बड़ा हंसाई है।
इस बेजान बुढिय़ा में, अब फिर से जान आई है।
बेटा पूछे मां तू कैसी, पोता दूध पिलाता है।
बहू की सेवा देख, दिल भी पिघल जाता है।
पकवानों ने घर को फिर से महकाया है।
परिवार का साथ देख, दिल मेरा भर आया है।
मेरे मरने चिंता सबको बड़ा सताई है।
बची कमाई पर सबने आंख गड़ाई है।
बहू देखे जेवर, बेटा सोचे धन कहां,
बूढिय़ा को फूंकने, जल्दी सब पे आयी है।
मेरे दिल की बलि चढ़ गई।
घर में बजी बधाई।
सबकी काली नियत सेे,
कालिख मुझ पर आयी।


5 comments:

जितेन्द्र देव पाण्डेय 'विद्यार्थी' said...

खूबसूरत

Kuldeep Gupta said...

well done
.............

journalist priyanka said...

AACHI KAVITA HAI. TUMNE SACH MEIN MA KE DARD KO BAHUT HI KHOOBSURTI SE BAYA KIYA HAI.
ALL THE BEST FOR WRITING SUCH POEMS IN FUTURE!!

neha said...

bahut khubsurti s tmne is kavita k likha haiz........

अंतर्मन said...

maa too maan hi hoti hai.. unka dard aaj tak kauin samjh paya hai.. mager woo sabka dard samjh jatti hainn
:)