Tuesday, 9 August 2011

कहां है

कहने को बहुत कुछ है मगर,
लेकिन शब्दों में विराम सा है,
राते कटती दर्द में अब तो,
सुबह को भी चैन कहां है,

प्रश्रों के संसार में,
उत्तर को भी वक्त कहां है,
लगा प्रश्रचिन्ह अस्तिव में,
खुद की भी पहचान कहां है,

डमरू, ढोलक पीटे सब,
फिर भी सफलता का वो सौपान कहां है,
खोज में निकले थे बरसों पहले,
जीवन की वो खोज कहां है,

हर पल धोखे खाए है,
विश्वास को भी वक्त कहां है,
महफिलों में मुस्काते है,
फिर भी दिल में सुकुन कहां है।
 अक्षय मिश्रा

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