Thursday, 17 March 2011

होली की हुड़दंग

होली की हुड़दंग,
आज खेलेंगे रंग,
पिया डोर की,
बन के पतंग,
भंग के संग,
घुलेगा अब रंग,
आसमां भी होगा,
आज लाल रंग,
जिंदगी की उमंग,
रहेगी अब संग,
प्यार का दिखेगा,
अब सतरंग,
घिसके बदन पर चंदन,
निकलेगी वो,
बन के किरण,
प्यार की होंगी,
आज कुछ बातें,
नम आंखों से,
होंगी मुलाकातें,
दिल की तरंग को,
लग गए पंख,
उडऩे को हूं,
बेताब तेरे संग,
घिस-घोंट कर,
पिलाईगी वो भंग,
झुम उठेगा फिर,
मेरा तन मन,
आज बनऊंगा मैं,
फिर से पवन,
दंग रहेंगे सब,
ये देख मेरा रंग,
झूम उठेगा,
आज ये गगन,
देख मेरे,
पिया की प्रेम अगन।

अक्षय मिश्रा




3 comments:

journalist priyanka said...

aachi kavita hai. tumhari kavita mein holi k rang se jayada prem ka rang dikh raha hai. aacha hai lage raho.

वृजेश सिंह said...

to samil ho jao holi ke huddang me.

अंतर्मन said...

agali holi mei main too yahi gaunga :P.. kaafi acchi kavita hai.. ek rasta hai ..