Sunday, 24 April 2011

मैं झूठा पथ प्रदर्शक

कहते-कहते रुक जाता हूं,
विचारों को अपने पी जाता हूं,
मंथन से निकले मोती को,
दिखलाने से डर जाता हूं।

लबों को सिए रहता हूं,
कलम बेच जिए रहता हूं,
अभिव्यक्ति के सागर में,
शब्द खोज जिए रहता हूं।

मक्कारों के  कलाम सुनता हूं,
खुद का अपमान चुनता हूं,
जीने की आस में अब,
झूठे शब्दों को बुनता हूं।

कलम की ताकत दिखलाता हूं,
दौर क्रान्ति का लाता हूं,
रसूखदारों की तलवार के आगे,
घुटने टेकता जाता हूं।

गीत शांति के गाता हूं,
नित नये ख्वाब दिखलाता हूं,
मैं झूठा पथ-प्रदर्शक,
निर्माता समाज का कहलाता हूं।

अक्षय मिश्रा

Saturday, 9 April 2011

जीने की राह में

राहों में हज़ार रोड़े हैं,
ख्वाबों की सॉल ओड़े हैं,
मंजिल पाने की होड़ में,
अपनों से दूर थोड़े हैं।

लुट  रहे अरमान हैं,
खो रही पहचान हैं,
धूमिल होते अस्तित्व को,
जीने का अरमान हैं।

मर-मर कर जी रहे हैं,
जहर गुलामी पी रहे हैं,
याद आती हैं वो वीर बलियां,
जो देश के नाम अर्पित हैं।

पथ भटक गया शेरों का,
साथ हो गया गैरों का,
रात कटी है खौफ में,
डर है अब बसेरों का।

चलते कांटों की सेज पर,
लड़ते मौत की रेत पर,
लेकिन शंख बजता है अब,
बस झूठों की मौत पर।

लहरों की मौज चाहिए,
हवा की ठंडक चाहिए,
जीना है सुकुन से अब,
तो आत्म-बलि चाहिए।
अक्षय मिश्रा