काली घनी रात थी, और कड़ाके की ठंड़ ने लोगों को उनके घरों में कैद कर रखा था। मैं भी उनहीं कैदियों में से एक था। ज्यों-ज्यों घड़ी की सुई सरकती जाती त्यों-त्यों ठंड़ अपने यौवन में प्रवेश करती जाती। मैं भी कागज़ की तरह अपने बिस्तर पर पड़ा रौशनदान से आसमां को निहार रहा था कि एकाएक मेरी नजऱ चंद्रमा पर जाकर ठिक गई। चांद को देख ऐसा प्रतित हो रहा था, जैसे कि वो हवा के ठंड़े झोंकों के बीच बड़ी ही बेसबरी से किसी का इंतजार कर रहा हो। चांद की इस इंतजार को देख मेरा मन भी समंदर की लहरों की तरह हिलोरे मारने लगा, मुझे भी अपनी ख्वाबों की प्रेसी की याद सताने लगी। ज्यों-ज्यों ठंड़ अपने शबाब पर आती त्यों-त्यों मेरी बेचेनी बढ़ती जा रही थी। मैं अपनी उमंगों को समेटे चांद को फिर से निहार ने लगा, लेकिन इस बार चांद अकेला न था। काले घटाओं की ओट में मानों किसी से बातें कर रहा हो। मैं वो अदभुत नज़ारा आंखों में समेटे पान खाने बाज़ार की ओर चल पड़ा। अपनी ख्वाबों की मलिका की यादों में डूबा, मैं खुद से बातें करते हुए वीरान सडक़ पर चला जा रहा था। एकाएक गाड़ी की पी-पी से मेरी निंद्रा टूट गई, आखें खुली तो देख में बाज़ार में था। बाज़ार को देख ऐसा लगा मानों किसी ने मुझे काटों के सेज पर लिटा दिया हो। एकाएक मेरी नज़र बाज़ार में मच रहे कोहराम पर पड़ी, ऐसा मंजर देख मेरी आंखें फटी की फटी रह गई, मेरी सारी उमंगें न जाने कहां खो गई। चंद मुठ्ठी भर व्यापारी एक 17-18 बरस की लडक़ी को बाज़ारु कहते हुए गालियां दे रहे थे। वहीं ये बुद्धिजीवी समाज चुप्पी साधे ये नग्र नाच बड़े मज़े से देख रहा था। आज इस सामाजिक बेडिय़ों ने मुझे बांध लिया, मैं भी मूक बन इस भयावह दृश्य को देख रहा था। वो लडक़ी सिर झुकाए, चुप्पी साधे, सामाज की कठोरता को देख वहां से चली गई, लेकिन मुझ पर सवालों का बोझ डाल गई। उस लडक़ी के मौन में वेदना थी और कई प्रश्र भी, मानो वो पूंछ रही हो कि इस समाज मैं सब मोम के पुतले बन गए है, क्या दुनिया से मानवता का अंत हो चुका है? किसी में इतनी हिम्मत भी नहीं है कि सामने आकर उन बातों का विरोध कर सकें। इस आधुनिक युग में भी लड़कियों की ऐसी गति देख मेरा मन द्रवित हो उठा, मैं खुद को कोस रहा था कि आखिर मैं मौन क्यों खड़ा रहा? मैं अपने बौनेपन को धिक्कार रहा था कि एकाएक मेरे मन मैं एक प्रश्र पैदा हो गया। क्या वो लडक़ी वास्तव में बाज़ारु है? मैं बेचेन हो उठा मेरे मन में उस लडक़ी से बात करने की जिज्ञासा जाग उठी, लेकिन वो तो वहां से जा चुकी थी। मैं उसे ढूंढऩे के लिए भागा, जैसे एक अबोध बालक अपना मां का पल्लू पकडऩे के लिए उसके पीछे-पीछे भागता है। वो मुझे मिल गई, मेरी आंखों के सामने खड़ी थी। उसे देख मुझे ऐसा लगा मानो मेरी अधूरी तपस्या पूर्ण हो गई। मेरे मन में उठ रहे उफान एकाएक थम से गए, मेरी व्याकुलता शांत हो गई। इतनी असीम शांति मुझे पहले कभी न मिली थी।
मैंने उससे बात करना चाहता था, लेकिन न जाने क्या हुआ मैं उससे कुछ कह न सका? शब्द मेरे जुबान पर आते-आते गुंगें हो जाते। वो लडक़ी की आंखे मेरी ओर देखते हुए मानो कह रही थी कि अब क्या हुआ? बोलते क्यों नहीं? तुम तो कुछ पूंछने आए थे न, तो फिर पूंछते क्यों नहीं? तुम मुझ से बातें करना चाहते थे, तो फिर क्यों मूक बने खड़े हो? उसकी निरंतर हो रहे ये प्रहार मेरे अंर्तमन को भेद रहे थे। मेरी आंखे शर्म से झुक गई। वो लडक़ी वहां से जाने लगी, मैं उसे रोकना चाहता था पर उसे रोकने की हिम्मत मुझमें न थी। उसकी अचल शांति देख मेरी जुबान ठिठक सी गई, मैं चाहते हुए भी कुछ कह नहीं पा रहा था। उससे से चार बातें करने की चाहत में मैं भी उसके पीछे-पीछे चल पड़ा, ऐसा लग रहा था जैसे वो मेरी पथ प्रदर्शक हो। मैं उसके पीछे चलते-चलते अपने घर तक आ पहुंचा, लेकिन उससे एक भी बात न कर सका। चांद की शीतलता भी अब मुझे रास नहीं आ रही थी। वो लडक़ी मुझे निहारते हुए वहां से चली गई। मानों मुझ से कह रही हो लो आज फिर समाज ने एक मानुष को बौना बना दिया, उसकी जिज्ञासा पर शिल का बोझ रख दिया। उस लडक़ी के तीखे प्रहार और मेरी अशांत जिज्ञासाओं ने मुझे उस लडक़ी को ढूंढऩे मजबूर कर दिया। उस रात के बाद मैं कई रातें भटकता रहा, बस इस आस में की शायद वो लडक़ी मुझे फिर से मिल जाए, मैं उससे कुछ बातें कर संकू, लेकिन फिर वो मुझे कभी न मिली। उस लडक़ी के तीखे प्रश्र और उसकी वो गंभीर आंखें आज भी मेरा पीछा कर रहीं हैं।
अक्षय मिश्रा

